“श्रेष्ठ भारत” डिजिटल प्लेटफॉर्म पर वरिष्ठ पत्रकार सुनील सिंह द्वारा पूर्व पुलिस अधिकारी प्रदीप शर्मा के साक्षात्कार की समीक्षा…

“श्रेष्ठ भारत” डिजिटल प्लेटफॉर्म पर वरिष्ठ पत्रकार श्री सुनील सिंह द्वारा सेवानिवृत्त पुलिस अधिकारी श्री प्रदीप शर्मा (प्रदीप रामेश्वर शर्मा) का एक विशेष साक्षात्कार प्रसारित किया गया, जिसका शीर्षक “११२  एनकाउंटर वाले प्रदीप शर्मा की अनसुनी कहानी” था। लगभग ५३.३४  मिनट की इस विस्तृत चर्चा के दो मुख्य बिंदु रहे: प्रथम, १९९० के दशक का अंडरवर्ल्ड और दाऊद इब्राहिम कसकर; तथा द्वितीय, प्रदीप शर्मा के जीवन पर आधारित आगामी फिल्म “अब तक ११२” का प्रचार।

इसमें कोई संशय नहीं है कि वर्ष १९८३ बैच के पुलिस उपनिरीक्षक (PSI) और ‘एनकाउंटर स्पेशलिस्ट’ श्री प्रदीप शर्मा मुंबई पुलिस बल के एक चर्चित और प्रभावी अधिकारी रहे हैं। यह भी एक तथ्य है कि अपनी विशिष्ट कार्यप्रणाली के कारण वे सदैव विवादों और आरोपों के घेरे में भी रहे। अक्सर यह देखा गया कि वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों ने अपनी सुविधानुसार उनका उपयोग किया, परंतु अंततः स्वयं पर कोई आंच न आये इसे ध्यान में रखते हुए प्रदीप को परिस्थितियों के सहारे छोड़ दिया। इसके बावजूद, मुंबई से अंडरवर्ल्ड के दमन में प्रदीप की भूमिका और उपलब्धियों को नकारा नहीं जा सकता।

आज वर्ष २०२६ में, जब प्रदीप शर्मा को पुलिस विभाग छोड़े सात वर्ष हो चुके हैं और दाऊद इब्राहिम का दौर पूरी तरह इतिहास का हिस्सा बन चुका है (यहाँ तक कि अब मुंबई में उसका नाम लेने वाले उसके अपने भी नहीं बचे हैं), ऐसे समय में इन विषयों पर पुनः चर्चा करना “श्रेष्ठ भारत” प्लेटफॉर्म की एक अनूठी, उल्लेखनीय और श्रेष्ठतम उपलब्धि कहा जा सकता है।

साक्षात्कार का दूसरा पहलू प्रदीप शर्मा पर केंद्रित आगामी फिल्म “अब तक ११२” के प्रचार-प्रसार की ओर स्पष्ट संकेत करता है। वरिष्ठ पत्रकार श्री सुनील सिंह ने अत्यंत कुशलता के साथ इन दोनों ही संवेदनशील मुद्दों को दर्शकों के समक्ष प्रस्तुत करते हुए अपनी विद्वता का परिचय दिया है।

हालाँकि, साक्षात्कार के दौरान सुनील सिंह द्वारा पूछा गया एक प्रश्न विचारणीय है। उन्होंने प्रदीप शर्मा से पूछा कि, “वर्दी उतर गई अब आप राजनीती में आ गये”

हिंदी भाषा पर असाधारण पकड़ रखने वाले और अत्यंत अनुभवी पत्रकार श्री सुनील सिंह के मुख से शब्दों का यह चयन थोड़ा विस्मय पैदा करता है। यह सर्वविदित तथ्य है कि प्रदीप शर्मा ने स्वयं सेवा से त्यागपत्र (इस्तीफा) दिया था, उन्हें विभाग द्वारा निष्कासित नहीं किया गया था। ऐसी स्थिति में “वर्दी उतरने” जैसे मुहावरे का प्रयोग अतार्किक प्रतीत होता है।   श्री सुनील सिंह, जो स्वयं १९९० के दशक से प्रदीप शर्मा और मुंबई पुलिस के घटनाक्रमों को करीब से देखते रहे हैं, वे इस तथ्य से भली-भाँति परिचित हैं। आशा है कि वे इस शब्दावली के पीछे के अपने दृष्टिकोण को स्पष्ट करेंगे।

अंत में, मीडिया जगत के अन्य सम्मानित पत्रकारों से भी यह विनम्र आग्रह है कि दाऊद इब्राहिम जैसे अतीत के अपराधियों को बार-बार विमर्श (Discussion) में लाकर अनावश्यक रूप से जीवित रखने या महिमामंडित करने का प्रयास कहाँ तक उचित है.  वर्तमान समय में समाज और देश के सामने कई अन्य ज्वलंत और महत्वपूर्ण विषय हैं, जिन पर चर्चा करना मीडिया के सामाजिक उत्तरदायित्व (Social Responsibility) के अनुकूल होगा।

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