परम” की लीला से त्रस्त हुआ लीलावती हॉस्पिटल: लीलावती हॉस्पिटल का आत्मघाती निर्णय
परमवीर सिंह का अतीत किसी एक घटना तक सीमित नहीं रहा, वह साक्ष्यों, विवादों और दागों से भरा पूरा इतिहास है। गंभीर आपराधिक मामलों में एफआईआर से लेकर फरारी तक का सफर तय कर चुका यह पूर्व अधिकारी कोई अनजाना नाम नहीं था। उसकी पृष्ठभूमि सर्वविदित थी। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि लीलावती अस्पताल प्रबंधन की वह कौन-सी मजबूरी थी कि सब कुछ जानते-समझते हुए भी एक दागदार, विवादित रिटायर्ड अफसर को ‘डायरेक्टर’ की कुर्सी सौंप दी गई?
आख़िर प्रबंधन के जीवन का वह कौन-सा काला अध्याय था, जिसे ढकने के लिए परमवीर जैसे चेहरे को ढाल बनाना ज़रूरी समझा गया?
जो व्यक्ति पुलिस महकमे के गलियारों में “पक्या सुपारी” के नाम से कुख्यात रहा हो, उसे लीलावती ट्रस्ट ने किस टारगेट को साधने के लिए नियुक्त किया था. यह अपने-आप में एक गंभीर और डरावना रहस्य है। लेकिन इतिहास गवाह है कि सुपारी लेने वाले की फितरत कभी नहीं बदलती। अंततः वही हुआ, कहा जा रहा है की, परमवीर ने उसी लीलावती की “सुपारी” बजा दी, जिसने उसे शरण, पद और ताक़त दी थी। अब राजीव मेहता के चीखने-चिल्लाने से क्या हासिल?
सीधी-सी बात है, अरे, वॉचडॉग ही चाहिए था तो कोई अच्छी नस्ल का कुत्ता रखते, बिना मतलब खुजली वाला कुत्ता पालने की जरूरत क्या थी?
परमवीर, आपकी यह अंतहीन लालसा आखिर कब थमेगी? आपकी इसी भूख ने न केवल आपको पतन की ओर धकेला, बल्कि पूरे मुंबई पुलिस बल की साख, सम्मान और विश्वसनीयता को भी कठघरे में खड़ा कर दिया है।



