
संजय बर्वे (कोब्रा) की गोपनीय रिपोर्ट से नीरज गुंडे के ‘X’ पोस्ट तक: एक अनसुलझी पहेली
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर नीरज गुंडे की एक हालिया पोस्ट ने महाराष्ट्र की राजनीति और पुलिस महकमे में खलबली मचा दी है। नीरज गुंडे, जिन्हें राजनेताओं और बड़े IPS अधिकारियों का करीबी माना जाता है, उनके द्वारा लगाए गए आरोपों ने सबको चौंका दिया है।
क्या है पूरा मामला?
नीरज गुंडे ने दावा किया है कि महाराष्ट्र कैडर का एक बड़ा IPS अधिकारी, जिसका अंडरवर्ल्ड (दाऊद इब्राहिम/डी-कंपनी) में कोड नेम ‘छोटा चेतन’ है, देश की बेहद संवेदनशील और गोपनीय जानकारी दुश्मनों तक पहुँचा रहा है। गुंडे ने मांग की है कि इस अधिकारी की संपत्ति की भी जांच हो और कड़ी कार्रवाई की जाए।

सवाल और संदेह: नाम बताने में हिचकिचाहट क्यों?
इस पूरे मामले में कई गंभीर सवाल खड़े होते हैं:
- नाम का खुलासा क्यों नहीं?: नीरज गुंडे सालों से मुंबई पुलिस के विवादित अफसरों और उनके इतिहास को करीब से जानते रहे हैं। फिर भी वे ‘छोटा चेतन’ का असली नाम खुलकर क्यों नहीं ले रहे?
- कौन है ‘छोटा चेतन’?: मुंबई पुलिस के गलियारों में चर्चा है कि यह नाम अक्सर “देवेन भारती” के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा है। गौरतलब है कि पूर्व पुलिस कमिश्नर संजय बर्वे (कोब्रा) ने 26 फरवरी 2020 को गृह विभाग को एक विस्तृत रिपोर्ट सौंपी थी, जिसमें देवेन भारती से मुंबई की सुरक्षा को संभावित खतरे की बात कही गई थी।
अंडरवर्ल्ड की जानकारी
नीरज गुंडे द्वारा जिस प्रकार कोड नेम और अंदरूनी सूचनाओं का उल्लेख किया गया है, उससे यह संकेत मिलता है कि नीरज गुंडे की अंडरवर्ल्ड तक भी पहुंच या जानकारी हो सकती है।
बदलते समीकरण: भारती, गुंडे और ‘देवाभाऊ‘
एक समय था जब देवेन भारती और नीरज गुंडे की गहरी दोस्ती के उदाहरण दिए जाते थे। साथ ही, नीरज गुंडे और मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस (देवाभाऊ) की निकटता भी जगजाहिर है। जानकारों का कहना है कि देवाभाऊ के ‘वरदहस्त’ (आशीर्वाद) के कारण ही देवेन भारती का पुलिस आयुक्त बनना संभव हो पाया था।
इस तरह के आरोपो के बाद अब प्रश्न उठ रहे हैं कि :
- क्या देवेन भारती पर से देवाभाऊ का हाथ हट गया है?
- क्या यह नीरज गुंडे का अपना कोई पुराना हिसाब बराबर करने का तरीका है?
- आखिर ऐसा क्या हुआ कि सालों पुरानी दोस्ती में इतनी कड़वाहट आ गई?
“इन बदलते समीकरणों ने राजनीति और मुंबई पुलिस महकमे में खलबली मचा दी है। सवाल यह है कि कल तक के मित्र आज एक-दूसरे के आमने-सामने क्यों खड़े हैं?”
निष्कर्ष: क्या होना चाहिए?
चूँकि यह मामला राष्ट्रीय सुरक्षा और दाऊद इब्राहिम जैसे घोषित अंतराष्ट्रीय आतंकियों से जुड़ा है, इसलिए:
- निष्पक्ष जांच: इस मामले की उच्च स्तरीय और पारदर्शी जांच अनिवार्य है।
- स्पष्टता की जरूरत: नीरज गुंडे को रहस्यमयी बातें करने के बजाय ठोस सबूत सामने रखने चाहिए। बिना नाम लिए आरोप लगाना केवल संस्थाओं की साख खराब करता है और जनता में भ्रम फैलाता है।
- सख्त कार्रवाई: यदि इन आरोपों में रत्ती भर भी सच्चाई है, तो संबंधित अधिकारी पर देशद्रोह के तहत कठोरतम कार्रवाई होनी चाहिए।
“अगर नीरज गुंडे के पास वाकई प्रमाण हैं, तो उन्हें बिना डरे नाम उजागर करना चाहिए। आधे-अधूरे संकेतों से न सच सामने आता है और न ही न्याय होता है।”
मामले में लगाए गए आरोप गंभीर प्रकृति के हैं। यदि आरोपों में तथ्य हैं, तो स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच आवश्यक है। साथ ही, सार्वजनिक मंच पर लगाए गए आरोपों के समर्थन में ठोस प्रमाण प्रस्तुत करना भी जरूरी है।
फिलहाल, इस पूरे घटनाक्रम ने राजनीतिक और पुलिस हलकों में कई सवाल खड़े कर दिए हैं। आधिकारिक प्रतिक्रिया और संभावित जांच के कदमों पर सबकी नजर बनी हुई है।




Yes, thorough enquiry to find out the truth, till then non executive posting and if found guilty strict punishment. The lower level officers non IPS are always target and enquiries conducted at the drop of a hat. This follows a chain of appeasement, extortion forcing even the good officers into doom. Set an example by finding put the truth.