एक सहायक उप-निरीक्षक, करोड़ों की धोखाधड़ी और साल भर का मौन , रेलवे पुलिस विभाग की “कार्यक्षमता” सवालों के घेरे में।

प्रति,
श्री राकेश कालासागर (IPS)
पुलिस आयुक्त, रेलवे
मुंबई
विषय: सहायक उप-निरीक्षक (ASI) रविंद्र दरेकर मामले में रेलवे पुलिस की “कार्यक्षमता” के लिए अभिनंदन।
महोदय,
मैं यह पत्र श्री रविंद्र दरेकर (ASI) के मामले में रेलवे पुलिस विभाग द्वारा पिछले एक साल में दिखाई गई “अनोखी कार्यक्षमता” के लिए आपको बधाई देने के लिए लिख रहा हूँ।
मैंने इस मामले में कई बार लिखित शिकायतें दीं। व्यक्तिगत रूप से पुलिस आयुक्त (रेलवे) के तौर पर आपसे (श्री कालासागर जी) मिलकर फॉलो-अप लिया, लेकिन पिछले एक साल से आप इस मामले को सिर्फ टालते ही रहे। आपकी ओर से हर बार नए बहाने बनाना वाकई में किसी कला से कम नहीं था। सच कहूं तो— “गजब के कलाकार हैं, कालासागर जी!”
यही नहीं, जाँच अधिकारी श्री राणमाले (ACP-GRP) के भी मैं लगातार संपर्क में रहा। लेकिन उन्होंने तो दरेकर को बचाने के लिए सारी हदें ही पार कर दीं। कानूनी कार्यवाही करने के बजाय, श्री राणमाले शिकायतकर्ता (योगेश जालिंदर अदाते ) को ही अप्रत्यक्ष रूप से डराने की पूरी कोशिश कर रहे थे ताकि वह पीछे हट जाए।
एक नागरिक के तौर पर हमें पुलिस आयुक्त से न्याय की उम्मीद होती है। लेकिन यहाँ पूरा तंत्र एक आरोपी ASI को बचाने और उसे जाँच से दूर रखने में लगा हुआ था।
हैरानी की बात तो यह है कि आपके ही विभाग के सहायक पुलिस आयुक्त (CST) ने लिखित रिपोर्ट में साफ कहा था कि यह धोखाधड़ी का अपराध है। इसके बावजूद कानून के हिसाब से एक्शन लेने के बजाय जानबूझकर “नई जाँच” का आदेश दिया गया, ताकि समय बीतता रहे और आरोपी बचा रहे।
शुक्र है कि शिवाजी पार्क पुलिस स्टेशन (मुंबई) ने CR No. 57/2026 दर्ज कर इस मामले में कार्रवाई की। इससे यह साबित हो गया कि मुंबई में कानून अभी भी जिंदा है। शिवाजी पार्क पुलिस की इस कार्रवाई ने यह दिखा दिया कि रेलवे पुलिस कैसे एक आरोपी को “संरक्षण” दे रही थी। इसके लिए मुंबई पुलिस कमिश्नर और उनकी टीम का जितना शुक्रिया अदा किया जाए, कम है।
विभाग में चर्चा है कि दरेकर ने पुलिस वालों के साथ ही करीब 15 से 18 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी की है और इसमें ‘हवाला’ का भी इस्तेमाल हुआ है। एक सेवारत पुलिसकर्मी बिना किसी कोर्ट स्टे के सिर्फ अधिकारियों की मेहरबानी से एक साल तक बचा रहा, यह बहुत गंभीर बात है।
उम्मीद है कि भविष्य में इस मामले को इस उदाहरण के रूप में याद किया जाएगा कि कैसे ‘मौन’ और ‘नई जाँच’ के नाम पर किसी आरोपी को बचाया जाता है।
आपका विश्वासपात्र,
राजेंद्रकुमार त्रिवेदी





